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इतिहास को भूलना लोकतंत्र को कमज़ोर करता है: हरिवंश नारायण सिंह
By Virat baibhav | Publish Date: 17/1/2026 6:47:47 PM
नई दिल्ली। ‘जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, वह न केवल अपना भविष्य खो देता है, बल्कि अपनी नैतिक दिशा भी खो देता है। इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, जनचेतना और राष्ट्रीय चरित्र की नींव है। इसलिए वीर विठ्ठलभाई पटेल की विरासत को पुनर्जीवित करना कोई अकादमिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक दायित्व है,’ यह बात राज्यसभा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने शनिवार को विश्व पुस्तक मेले में दिल्ली विधान सभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित कॉफी टेबल बुक ‘वीर विठ्ठल भाई की गौरव गाथा: एक शताब्दी यात्रा’ पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही। इस अवसर पर दिल्ली विधान सभा के माननीय अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, पूर्व राज्यसभा सांसद एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे, प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौर, अध्यक्ष, कला निधि ट्रस्ट, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र , डॉ. मनीषा चौधरी, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय सहित शिक्षाविद्, इतिहासकार, विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित थे। अपने संबोधन में हरिवंश नारायण सिंह ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक अपेक्षाकृत विस्मृत अध्याय को पुनर्जीवित करने के लिए दिल्ली विधान सभा सचिवालय के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने पुस्तक को भारतीय इतिहास के एक अत्यंत जीवंत और निर्णायक काल का प्रामाणिक दस्तावेज बताया। रॉलेट एक्ट काल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वीर विठ्ठलभाई पटेल ने विधायी परिषद में 220 से अधिक संशोधन प्रस्तुत किए और परिषद के प्रथम भारतीय अध्यक्ष बने। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सिद्धांत आधारित विधायी कार्यवाही के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों और जनचेतना को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने वीर विठ्ठलभाई पटेल की व्यक्तिगत ईमानदारी, औपनिवेशिक सत्ता से समझौता न करने का साहस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को दिया गया मार्गदर्शन तथा स्वतंत्रता संग्राम हेतु अपनी वसीयत और संसाधन सौंपने का भी उल्लेख किया। अपने संबोधन में विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि दिल्ली विधान सभा परिसर को एक सांस्कृतिक एवं विरासत स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में सक्रिय प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि भावी पीढिय़ां भारत के विधायी इतिहास, लोकतांत्रिक परंपराओं और स्वतंत्रता संग्राम से सार्थक रूप से जुड़ सकें।