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सतुआ संक्रांति: देवताओं को प्रिय तो दान से तृप्त होते हैं पूर्वज, जानें सत्तू व घड़े के दान का महत्व
By Virat baibhav | Publish Date: 14/4/2026 3:55:28 PM
सतुआ संक्रांति: देवताओं को प्रिय तो दान से तृप्त होते हैं पूर्वज, जानें सत्तू व घड़े के दान का महत्व

नई दिल्ली। आज देश भर में सतुआ संक्रांति या सतुआन पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन घड़ा, पंखा, सत्तू और ठंडे फलों का दान करने का विधान है। मान्यता है कि ये दान करने से ढेरों पुण्य प्राप्त होते हैं।  धार्मिक मान्यता है कि इस दान से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और पूर्वजों की आत्माएं तृप्त हो जाती हैं। सतुआ संक्रांति गर्मी के मौसम की शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि को पराजित करने के बाद सबसे पहले सत्तू का भोजन किया था। इसी वजह से इस दिन सत्तू का सेवन और दान करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। धर्म शास्त्र के विद्वानों के अनुसार, सतुआ संक्रांति का पर्व सनातन धर्म में अति महत्व रखता है। यह दिन भगवान सूर्य के राशि परिवर्तन से जुड़ा है। आज सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश कर रहे हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और सूर्य देव की पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा-पाठ के बाद श्रद्धालु सत्तू, जल से भरा घड़ा, गुड़, मौसमी फल जैसे बेल, तरबूज, खरबूज और कच्चा आम, ककड़ी, खीरा आदि का दान करते हैं। भरा हुआ घड़ा दान करने से पितर तृप्त होते हैं जबकि सत्तू दान करने से देवता प्रसन्न होते हैं और पापों का नाश होता है। यही नहीं यह दिन ग्रह दोष शांति से भी जुड़ा है, जिनकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर है, वे इस दिन जल से भरा घड़ा दान करें तो चंद्रमा बलवान होता है। यह दिन मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ ही खरमास का समापन हो जाता है। खरमास खत्म होने के बाद शुभ कार्य जैसे विवाह, उपनयन संस्कार और अन्य मांगलिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं।
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