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एम्स विशेषज्ञों ने बढ़ते जीआई रोगों के बोझ की जल्द पहचान का अपील की
By Virat baibhav | Publish Date: 1/9/2026 7:51:32 PM
नई दिल्ली। गैस्ट्रोएंटरोलॉजी से संबंधित रोगों का वैश्विक बोझ बढ़ रहा है,और दुनिया में लगभग हर तीसरे व्यक्ति में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लिवर से संबंधित बीमारी के लक्षण पाए जाते हैं। इसके अलावा हर दूसरा व्यक्ति हेलिकोबैक्टर पायलॉरी संक्रमण से संक्रमित है और हर तीसरा व्यक्ति अपनी आंत में कृमियों से संक्रमित है। मानवता को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी बीमारियों में से एक अब फैटी लिवर रोग है और हर तीसरा व्यक्ति फैटी लिवर रोग से पीडि़त है। गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियां वैश्विक स्तर पर और भारत में भी बढ़ रही हैं।भारत गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों के बदलते परिदृश्य के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है बढ़ती जागरूकता बेहतर स्वच्छता उपायों और प्रभावी राष्ट्रीय नीतियों ने हमारे देश में संक्रामक रोकथाम योग्य रोगों के बोझ को काफी कम किया है। हालांकि फैटी लिवर और कोलोरेक्टल कैंसर जैसी मेटाबॉलिक स्थितियों के रूप में एक बड़ी चुनौती सामने है। इस चर्चा में डॉ. प्रमोद गर्ग, प्रोफेसर एवं प्रमुख गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं ह्यूमन न्यूट्रिशन विभाग एम्स नई दिल्ली अध्यक्ष, इंडियन सोसाइटी ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और सह अध्यक्ष संचालन समिति डब्ल्यूसीओजी 2026 डॉ.गोविंद मखारिया, प्रोफेसर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं ह्यूमन न्यूट्रिशन विभाग एम्स, नई दिल्ली और अध्यक्ष, स्थानीय आयोजन समिति डब्ल्यूसीओजी 2026, डॉ. शालीमार, प्रोफेसर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं ह्यूमन न्यूट्रिशन यूनिट एम्स, नई दिल्ली तथा डॉ. विनीत आहूजा, प्रोफेसर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं ह्यूमन न्यूट्रिशन विभाग एम्स नई दिल्ली और सेकेटरी जनरल क्रॉन्स कोलाइटिस फाउंडेशन ऑफ इंडिया शामिल हुए। फैटी लिवर एक प्रमुख चिंता के रूप में सामने आया। एक एम्स के नेतृत्व में किए गए व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि यह स्थिति 38.6 प्रतिशत भारतीय वयस्कों और 35.4 प्रतिशत भारतीय बच्चों में मौजूद है। इसका मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप से करीबी संबंध है। फिर भी, यह लिवर को नुकसान पहुंचने तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रह सकता है इसका उदाहरण हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन है, जिसमें चिंताजनक रूप से बताया गया कि टाइप 2 डायबिटीज से पीडित हर चार मरीजों में से एक में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस है। डॉ. प्रमोद गर्ग ने कहा भारत इस समय एक महामारी विज्ञान संबंधी बदलाव का सामना कर रहा है। हमने जागरूकता टीकाकरण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के माध्यम से रोकथाम योग्य बीमारियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। डॉ. गोविंद मखारिया ने कहा भारत में कभी भी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या तकनीक की कमी नहीं रही है। हमारे सामने कमी रही है तो वह शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेने की आदत और अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा न करने की। हम अक्सर अपने लक्षणों को तनाव से जोड़ देते हैं या उन्हें नजर अंदाज कर देते हैं। कुछ लोग डॉक्टर के पास पहुंचने से पहले महीनों तक बिना डॉक्टर की सलाह के मिलने वाली दवाएं लेते रहते हैं। हमें यह समझना होगा कि जब भी हम किसी बीमारी की जल्द पहचान करने में विफल रहते हैं, तो हम उसके प्राकृतिक विकासक्रम को संभावित रूप से बदलने का अवसर खो देते हैं। कोई भी लक्षण यदि दो से तीन सप्ताह से अधिक समय तक बना रहता है तो उसकी जांच कराई जानी चाहिए।