Tuesday,13 October 2026,08:54 PM
ब्रेकिंग न्यूज़
आज तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार ही शक्ति के नए स्रोत, 'पावर टू एम्पावर' ही नए युग की सबसे बड़ी ताकत: पीएम मोदीसोनाली बेंद्रे ने छेड़ा शादी का किस्सा, माधुरी दीक्षित बोलीं-इसलिए दिलों का इलाज करने वाले को चुनाअर्जुन बिजलानी ने पत्नी नेहा के साथ काम शो करने के पीछे की बताई वजह, बोले-मस्ती और धमाल होगाउज्जैन के सिंहस्थ कुंभ से इंदौर का महत्व बढ़ेगा : सीएम मोहन यादवब्रिस्बेन ओलंपिक 2032 की सीईओ सिंडी हुक अपना पद छोड़ेंगीमां रूपी सोरेन के श्राद्धकर्म में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने निभाई पारंपरिक रस्मेंबरेली में मुख्यमंत्री योगी ने ग्राम प्रहरियों का किया सम्माननीता अंबानी की पहल: दृष्टिबाधितों के लिए अब हर सप्ताह आएगा ब्रेल अखबार
धर्म-कर्म
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार कर्म की सिद्धि के लिए जरूरी हैं ये 5 कारक
गीता के अध्याय 18 के श्लोक 14 में कर्म की सिद्धि के लिए अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव को बताया गया है
By Viraat Vaibhav | Publish Date: 2/10/2026 3:51:37 PM
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार कर्म की सिद्धि के लिए जरूरी हैं ये 5 कारक

कर्म और सफलता के पांच कारकों को दर्शाती श्रीमद्भगवद्गीता।

नई दिल्ली। श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन को समझने और सही दिशा में आगे बढ़ने की सीख देने वाला ऐसा ज्ञान है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म, कर्तव्य और उसके परिणामों को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। इन्हीं में से एक है कर्म की सिद्धि के लिए बताए गए पांच कारक। मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इसके बारे में जानकारी दी है। अक्सर हम किसी काम में सफलता मिलने पर पूरा श्रेय खुद को देते हैं और असफलता मिलने पर किस्मत को दोष देने लगते हैं। लेकिन गीता के अनुसार किसी भी कर्म के पूरा होने के पीछे केवल एक व्यक्ति की मेहनत नहीं, बल्कि पांच तत्वों की भूमिका होती है। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 14 में इन पांच कारकों का उल्लेख मिलता है।

कर्म की सिद्धि के पांच कारक

यह श्लोक है, अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।

कर्म की सिद्धि का पहला कारक अधिष्ठान है, जिसका अर्थ है शरीर। जिस शरीर के माध्यम से हम कोई काम करते हैं, वही कर्म का आधार बनता है। दूसरा कारक है कर्ता, यानी वह व्यक्ति या जीवात्मा जो किसी काम को करने का संकल्प लेता है। किसी भी कार्य को शुरू करने के पीछे व्यक्ति की इच्छा, सोच और निर्णय महत्वपूर्ण होते हैं।

इंद्रियां और साधन भी महत्वपूर्ण

तीसरा कारक है करण यानी इंद्रियां और साधन। इसका अर्थ है वे साधन या उपकरण, जिनकी मदद से कोई काम पूरा किया जाता है। इसमें हमारी आंखें, कान, हाथ-पैर जैसी इंद्रियां शामिल हैं।

लगातार प्रयास की भूमिका

चौथा कारक है चेष्टा, यानी किसी काम को पूरा करने के लिए किए जाने वाले अलग-अलग प्रयास। केवल इच्छा रखने से सफलता नहीं मिलती, उसके लिए लगातार मेहनत और सही दिशा में कोशिश करना जरूरी है।

पांचवां कारक है दैव

पांचवां कारक है दैव। इसका संबंध उन परिस्थितियों और प्रभावों से है, जो पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं होते। इसमें दैवीय व्यवस्था, प्रकृति के नियम और पूर्व कर्मों से जुड़ी पारंपरिक व्याख्याएं शामिल हैं।

COPYRIGHT @ 2016 VIRAT VAIBHAV. ALL RIGHT RESERVED.DESIGN & DEVELOPED BY: 4C PLUS